धार्मिक व्यक्ति के अनुसार पहले ज्ञान था अब हम ज्ञान को भूल चुके हैं और अज्ञानी हो गए
विज्ञान के अनुसार पहले हम कम जानते थे आज हम पहले से ज्यादा जानते हैं क्यों की विज्ञान मे हर चीज को खा कर, चख कर महसूस किया जाना की क्या चीज अच्छी है क्या चीज बुरी है जिसमे उनकी पीड़ियाँ निकल गयी हैँ तब जाकर वर्तमान पीढ़ी को उतना ज्ञान मिलता है जो काफी नहीं होता है
भविष्य में हमें और भी बहुत कुछ जानना है क्यों कि ज्ञान धीरे धीरे बढ़ता है
धार्मिक व्यक्ति कहता है सत्य मेरे मजहब में है क्यों की सत्य सिर्फ मेरा ही मजहब है मेरे मजहब मे जो लिखा है वही सत्य है जो कुछ सत्य था वह मेरे मजहब की धार्मिक किताब में लिखा जा चुका है
मेरे मजहब की सारी बातें सच है
जबकि विज्ञान कहता है अभी तक के प्रयोगों और अनुभवों के अनुसार हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं
अभी हमें और सत्य जानना है
विज्ञान कोई दावा नहीं करता
उसके पास कोई वाद नहीं है
यहां आपकी पसंद-नापसंद का कोई मतलब नहीं है
यह किसी को अपनी बात मानने के लिए दबाव नहीं डालता
विज्ञान के पास घमंड नहीं है वह नम्र है
विज्ञान अपना लाभ उसे भी देता है जो उस में यकीन नहीं करते
बुखार होने पर अल्लाह का नाम उसी को राहत देता है जो अल्लाह में यकीन करता है
इसी तरह बुखार होने पर राम का नाम उसी को शांति देता है जो राम में विश्वास करता है
लेकिन विज्ञान के द्वारा बनाई गयी बुखार की दबाई दोनों पर असर करेंगी चाहे उसमे उसकी आस्था हो या ना हो बो हर व्यक्ति पर एक समान असर करेगी
विज्ञान का बनाया हुआ पंखा सबको एक जैसी शीतलता देता है भले ही आप विज्ञान और पंखे में यकीन करते हैं या नहीं
मनुष्य आज जो जी रहा है वह वैज्ञानिक समझ के कारण जी पा रहा है
घर बनाने का विज्ञान हो समाज और आपसी रिश्ते समझने का समाज विज्ञान या मनोविज्ञान हो पहिए की खोज से लगाकर चिकित्सा या अन्य जीवन का कोई भी क्षेत्र हो
मनुष्य ने देखकर समझ कर खोज करके समझ को आगे बढ़ाया है
समाज का काम काज संविधान कानून समाज विज्ञान के आधार पर चलता है
संविधान कहता है सबके मानव अधिकार एक समान है
लेकिन मजहब में डूबे हुए लोग एक दूसरे के मानव अधिकार कुचले जाने पर खुश होते हैं
धर्म की बुनियाद पर अलग-अलग समुदाय में बंटे हुए लोग खुद को दूसरों से अलग समझते हैं और दूसरे की तकलीफ पर या तो ध्यान नहीं देते या उन्हें तकलीफ में देखकर खुश होते हैं और तकलीफ देने वाली सरकार का समर्थन करते हैं
जबकि सच्चाई यह है हम सबके सुख दुख सांझे हैं धरती सांझी है समाज सांझा है एक समुदाय तकलीफ में रहेगा तो तकलीफ सबको होगी
लेकिन अभी समझदारी पर आधारित समाज बनना बाकी है

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